Tuesday, October 26, 2010

My favorite songs...

मिसरा ग़ालिब का और कैफियत हर एक की अपनी अपनी ... दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात दिन... .... इसके आगे के संवाद तो मुझे याद नहीं हैं, पर ये पंक्तियाँ मुझे बहुत ही अच्छी लगती हैं| वस्तुतः एक पुराना कैसेट था मेरे पास, उसमें गुलज़ार साहब के संवादों के साथ जावेद अख्तर के फ़िल्मी नगमे थे... ये ऊपर वाली पंक्ति भी उसी का एक हिस्सा है| गीत क्या थे एक गुलदस्ता था, इसमें गुलाब की खुशबू, उसमें मोगरे की महक, कोई चंपा, चमेली के रंग-ओ-बू के साथ तो किसी में गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू वाली यादें, एक तन्हाई की बेबसी समेटे तो एक में दर्द बाँट लेने की पुरजोर चाहत | शायद मेरे छोटे से collection का सबसे हसीन नगीना था वो...
वक़्त गुजरता ही रहता है | कभी, कहीं नहीं ठहरता... वक़्त के साथ उन पुराने गानों से लगाव तो कम नहीं हुआ पर कुछ और गीत या उनकी कुछ पंक्तियाँ कुछ इतनी अच्छी तरह से मुझ से मेल खा गयीं कि लगता है कि लिखने वाले के सामने मेरी जिन्दगी की किताब खुली रखी थी और उसने शब्दों को गीत में गूंथ कर उनमें जान डाल दी, 'बस इतनी सी जान होती है एक गीत में, एक लम्हे जितनी, हाँ ...कुछ लम्हे बरसों बरस जिंदा रहते हैं" [ओ... फिर से उसी में से लाइन उठा ली :-) ].
हाँ जी, तो सभी तो नहीं, पर इस तरह के कुछ गीतों की बानगी पेश-ए-खिदमत है ... क्यों भला?? बस यह पूछ कर मुझे बगलें झांकने पर मजबूर ना कीजियेगा... बस कुछ गीत गुनगुनाते हुए ये लिख बैठा हूँ..
1. अज़ीब दास्ताँ है ये... कहाँ शुरू कहाँ ख़तम... ... ये मंज़िलें हैं कौन सी... ना वो समझ सके ना हम 
(फिलहाल मेरी रिंग टोन यही है.. इसलिए "top of the mind" recall...! .. :-) understandably, MBA sneaks in at times!)
2. एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में.... आब-ओ-दाना ढूँढता है, आशियाना ढूँढता है.
इन उम्र से लम्बी सड़कों को.. मंजिल पे पहुंचते देखा नहीं, बस दौड़ती फिरती रहती हैं, हम ने तो ठहरते देखा नहीं
3. ऐ जिन्दगी......... गले लगा ले..... हमने भी..... तेरे हर इक गम को.. गले से लगाया है .. है ना? 
4. वहाँ कौन है तेरा... मुसाफिर .. जाएगा कहाँ? दम ले .. दम ले घड़ी भर .. ये छैंया पायेगा कहाँ?
5. अभी ना जाओ छोड़ कर .. के दिल अभी भरा नहीं...
6. रूक जाना नहीं.. तू कहीं हार के... काँटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के.. 
7. जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है, आंधी से तूफ़ान से डरता नहीं है, तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें, मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें, तुझको चलना होगा.. तुझको चलना होगा..
8. गोरे रंग पे इतना गुमान कर, गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा..! [बस यही एक लाइन... :-) ]
9. इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना .. 

जब गुस्सा आता है तो ये गीत भी याद आता है....
10. मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे, मुझे ग़म देने वाले तू ख़ुशी को तरसे...
गीतों की फेहरिस्त तो शायद ख़त्म ना ही हो, पर ये ब्लॉग तो करना ही होगा... तो बस आज यहीं तक.. फिर अगली बार मिलते हैं, एक छोटे से ब्रेक के बाद...
अरे हाँ... बस एक और ....अंत में.....  क्यूँ पैसा पैसा करती है? क्यूँ पैसे पे तू मरती है...? एक बात मुझे बतला दे तू, उस रब से क्यूँ नहीं डरती है.....!!!
:-)
अब ये मत पूछ बैठना के ये दाल भात में मूसरचंद जैसा गाना कहाँ बीच में ला के पटक दिया.... बात ये है कि जब भी अदालत में निमिता जी से मुलाक़ात होती है तो इससे उपयुक्त गाना दिमाग में आता ही नहीं  :-) ... btw...  ताज़ा खबर ये है कि निमिता जी के भाई ने अपनी 'तारे तोड़ लाने की ख्वाहिश'  (रू. दो करोड़ की demand) को कम करके मुझ पर एहसान करने का दिखावा कर दिया है.. सुनते हैं कि अब भाई बहन सिर्फ 25 लाख चाह रहे हैं... एक या दो साल में शायद मेरी औकात के अन्दर की राशि पर भी आ जायेंगे... उम्मीद पे तो दुनिया टिकी है, ये नाचीज़ भला क्या खाक परे जाने की कोशिश करेगा.. तो मैं भी नाउम्मीद नहीं हुआ हूँ| अभी बहुत जान बाकी है सितमगर .. कुछ और तीर भी चला!

Tuesday, October 19, 2010

बात एक शाम की ...!

नमस्ते दोस्तों,
बहुत दिन हुए आप सभी से मिल कर बातें किये हुए |  जिंदगी इतनी बदल गयी है कि अपने आप के लिए भी सुकून भरा वक़्त निकालना मुश्किल हो गया है | कुछ हालात मुश्किल हैं, बाकी की कसर आलस पूरी कर देता है | 
कल दशहरा था और मैं भी रावण दहन देखने घूमते फिरते कहीं पहुँच ही गया | जगह महत्वपूर्ण नहीं है, मेरा वहाँ पहुँचना... है|        हाँ तो वहाँ का नज़ारा हमेशा की तरह जिन्दगी के रंगों से भरा हुआ था | एक रसिक की मानिंद मैं उन रसों का आनंद उठता घूमता रहा और ग़मों को भुलाता रहा | नहीं, नशे में बिलकुल नहीं, आप तो जानते ही हैं कि मैं नशा नहीं करता.. पर जैसा कि मेरी एक पसंदीदा फिल्म का संवाद है - 'जिन्दगी भी एक नशा है दोस्त, जब चढ़ता है पूछो मत क्या आलम रहता है...' आगे और भी है पर वो मेरे मतलब का फिलहाल नहीं है | अभी मुझ पर छाये जिन्दगी के नशे को उतरने में मुद्दतें बाकी हैं | 
पर मैं फिर बहक गया... तो मुद्दे की बात ये है कि मैं जिन्दगी का लुत्फ़ उठता मेले में घूम रहा था |  कुछ छोटे बच्चे, कुछ बहुत छोटे बच्चे, कुछ बड़े बच्चे, कुछ बड़ों के भेष में, पर फिर भी अन्दर से बच्चे, कुछ गोदी में, कुछ पापा, चाचा, मम्मी का हाथ कस कर पकड़े, कुछ के हाथ बड़ों ने बड़े जोर से पकड़े, वो भाग भाग कर मस्ती करने को उत्सुक, ये उनके भीड़ में गुम हो जाने के ख्याल में चिंतित, कुछ अपने दोस्तों के साथ मस्ती में डूबे, और कुछ मेरे जैसे निपट अकेले ही घूमते, रावण के मारे जाने का इन्तजार कर रहे थे| 
मतलब ये हर तरफ बच्चे ही बच्चे थे और एक ओर पंडाल लगा था उसमें रामलीला चल रही थी | कुछ चुटीले संवाद और बाकी वही, सदियों पुरानी पर नित नयी कहानी के रोमांचक अध्यायों वाले रंग बिरंगे पन्ने पलटे जा रहे थे | ऐसी जगह हो, इतना भीड़ भड़क्का हो और चाट फुलके के ठेले ना हों, भला हो सकता है? अजी बिलकुल नहीं, होना भी नहीं चाहिए... तो चाट के ठेले भी थे | लकड़ी की तलवार और छोटी छोटी गदा के संग चमकीले रंगीन कागजों से सजे धनुष बाण बेचने वाले, चाय की चुस्कियां, गरमा गरम मूंगफल्ली, चटपटे चने, मीठे बुड्ढी के बाल, फुग्गे आदि को साथ में लिए घुमंतू सौदागर, अपने अपने चाहने वालों को खोजते भटक रहे थे | अब चाट के ठेलों को तो भटकना नहीं पड़ता उनके चाहने वाले खुद ही ठेलों को ढूंढ ही लेते है, तो काफी सारे लोग चाट, पकोड़े, पाव भाजी, गुपचुप, भेल, आइसक्रीम .. और पता नहीं क्या क्या खाते मजे कर रहे थे| 
मजे की बात ये कि रामलीला के पंडाल के सामने बैठने की खासी व्यवस्था की गयी थी पर मैंने देखा कि वो जगह बमुश्किल एक चौथाई भरी होगी और कम नहीं तो 5-6 गुना लोगबाग बस बाहर ही बाहर से रामलीला का आनंद ले रहे थे| जबकि ना तो कोई टिकिट थी ना ही कोई रोक टोक. अब जिन्दगी के रंगों की ये भी एक बानगी है |
मकरध्वज और हनुमान संवाद अपने चरम पर था, और जितने भौंचक हनुमानजी थे ये जान कर कि मकरध्वज उनका ही पुत्र है, उतने ही आश्चर्यचकित मेरे कुछ प्रौढ़ अड़ोसी पड़ोसी (कम से कम तत्कालीन पड़ोसी) भी हुए थे, गोया कि इतने सालों से रामचरितमानस का पाठ कर रहा हूँ, ये बात मुझे आज रामलीला में ही पता चली?? ओ हो.... चलो भला हुआ कि मेरे पोते पोतियों को मेरी चूक का पता नहीं चला... कनखियों से जो देखा तो उनके पोते खिलखिला रहे थे | पता नहीं रामलीला ने या किसी और बात ने उनके चेहरों पे रौनक ला दी थी |
खैर, धीरे धीरे शाम ठंडी होते हुए रात में बदलती जा रही थी और पंडाल के सामने भीड़ बढ़ती जा रही थी, वास्तव में पूरे मैदान में ही भीड़ बढ़ गयी थी | कहानी का चरमोत्कर्ष आने ही वाला था और वो पल भी, जिसके लिए इतने सारे बच्चे वहां आये थे, फिर माइक पे कोई चिल्लाया... मेरा मतलब है कि उदघोषणा की गयी.. उसका निचोड़ ये था कि जिस व्यक्ति को रावण को आग के हवाले करने की जिम्मेदारी दी गई थी वो अपनी नियत जगह पर पहुँच जाये, जिम्मेदारी पूरी करने का वक़्त आ गया है.. किसी अहमद का नाम पुकारा गया.. या शायद मेरे कान बज रहे थे, या शायद हमारे प्रबुद्ध नेताओं को वहां होना चाहिए था इस छोटी मगर अद्भुत उदघोषणा को सुनने के लिए| वस्तुतः सांप्रदायिक सौहाद्र के छोटे छोटे ऐसे ढेर सारे उदाहरण हमारे आस पास बिखरे मिल जाते हैं| थोड़ा और गहराई में जाकर देखें तो रामलीला के कलाकार भी विभिन्न धर्मों के मानने वाले मिलना कोई अनोखी बात नहीं है| 
वापस रावण दहन पर आया जाए, तो फिर अंततः रावण जल उठा .. लोगों का हुजूम जो अभी तक रामलीला की ओर उन्मुख था अचानक ही नया शिगूफा पा कर दूसरी ओर दौड़ पड़ा .. आग, पटाखों की सुरसुराती हुई रस्सी की शक्ल में, रावण के पुतले के दस सिरों की ओर बढ़ चली... और एक एक कर के सभी दस सिरों से रंग बिरंगी चिंगारियां बरसने लगीं, फिर कुछ विचित्र से रंगीन आग वाले गोले उसके मुंह में से लटकते दिखने लगे, अचानक ही रावण थोड़ा funny सा हो गया था, किसी ने बगल से ताना मारा, '*$^&* रावण हंस रहा है'... शायद सचमुच रावण हंसता ही होगा.. हम हर साल रावण जलाने का उपक्रम करते हैं, ख़ुशी मनाते हैं पर क्या वाकई इतने सारे रावणों में से एक भी जलता या मरता है?? शायद इस सवाल का जवाब हम सभी को अपने अपने स्तर पर ही खोजना होगा, ये वाकई इतना आसान नहीं होगा| पर यदि हमारे अन्दर की एक बुराई भी इस आग में जल जाए तो शायद एक विजयादशमी अपने नाम को सार्थक कर पाएगी |
मैं फिर भटक गया... यही समस्या है emotional  होने में, जरा सा सूत्र मिला और मन दौड़ चला दूसरी ओर... खैर, मुझे लगा अब अंतिम दो तीन मिनट में रावण धुंआ हो जाएगा पर नहीं, आयोजक वाकई चतुर थे, उन्होंने कुछ आतिशबाजी का भी इंतजाम किया था और वो आतिशबाजी, जो बहुत विशाल या विहंगम तो नहीं थी पर हम बच्चों को खुश करने और रोकने और 'अरे वाह!!!' हो.... वो... चिल्लाने के लिए पर्याप्त थी, पूरे दस मिनट से कुछ ऊपर ही चली, बीच में रावण शायद तड़पता रहा होगा.. जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए... फिर उस पर दया करके अब पूरे तरीके से उसमें आग लगा दी गयी और एक बार फिर रावण धूं धूं कर जल उठा.. बस दो मिनट और अब वहां बांस का एक ढांचा ही बचा था, जिसे देखने में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं थी.. अब सभी को याद आ गया था कि उनके अलावा कितने ज्यादा लोग भीड़ बने बैठे हैं, और घर जाने की जल्दी मचने लगी . 
बस .. अब आगे और क्या? मैं भी जल्दी से घर की ओर भाग चला... आखिर रात में TV  पर फिल्म भी तो देखनी है, दोस्तों से मिलना है, केस की तैयारी करनी है, और भी बहुत काम हैं... ओ .. भूख भी लग रही है.. चलो... अगली बार मिलते हैं.. कुछ और गपशप करेंगे.. 
टाटा ... शुभ विजयादशमी 
शुभ रात्रि... ! 
फिर मिलेंगे.....!!!