ख़त्म होती कहानियाँ नए किरदारों को जन्म देती हैं...
मेरे एक प्रबुद्ध मित्र, सुबोध ने ये एक फोटो के title में लिखा। ये गहरी बात, मुझे सिर्फ छू नहीं गयी बल्कि अंदर तक हिला गयी, दिमाग में बैठ गयी और कुछ पुराने विचारों को खंगालने का अवसर भी बना और blog की बरसों पुरानी ख़ामोशी भी भरभरा कर टूट गयी।
हर वो चीज जो शुरू होती है, ख़त्म होना उसकी नियति होती है, चाहे वो कहानियाँ हो या किरदार। पर क्या वाकई वो ख़तम होते हैं या अश्वत्थामा का श्राप लिए जीते रहते हैं, बदलते रहते हैं? हम जिसे आरम्भ कह कर जान पाते हैं, वस्तुतः, सिर्फ अपने समझ-बोध तक, क्या वो वास्तव में आरम्भ होता है?
एक पेड़ का आरम्भ, बीज से, और वो बीज कहाँ से आया था? एक ख़त्म होते फल से, वो, वो भी तो किसी पेड़ की खूबसूरत सी कहानी का हिस्सा था, ख़तम होती हुई एक कहानी, जिसने किसी नए किरदार को जन्म दिया और अपना अस्तित्व ख़ुशी से ख़त्म हो जाने दिया। हर गाथा, छोटी हो या हो महागाथा, हर वृतांत, हर रूपक, अपने आप में सम्पूर्ण होकर भी किसी और से सम्बद्ध होता है, आप जितना चाहे इंकार कर लीजिये असंपृक्त रह पाना असंभव है।
मैं, आप, वो, हर कोई एक काव्य से सम्बंधित हैं, अपने आप में भी एक कथा हैं, कहानी हैं। हमारी कहानियाँ भी एक दूसरे की कहानियों से मिलती, उलझती और अलग होती रहती हैं। साथ ही हम भी धीरे धीरे ख़तम होते रहते हैं, और सृजन करते रहते हैं, किसी नए किरदार का, फर्क नहीं पड़ता, जान कर या अनजाने। कभी अचानक एक मोड़ पर एक अहसास होता है, अपनी कहानी का, अपने ही किरदार का और फिर हम परिपक्व होने की ओर अगला कदम बढ़ा देते हैं, एक गहरे सुकून के साथ।
शायद यही वो खास पल होता है, जब उस पेड़ की तरह हम जान जाते हैं, अपने होने का अर्थ, कारण और समय की धार में गढ़ते हुए उस बड़े, बहुत बड़े महाकाव्य में अपनी अहमियत। ये बहुत महत्वपूर्ण अनुभूति, नितांत व्यक्तिगत आनंद, गूँगे का गुड़ हो जाता है, महसूस होता है, बताया, समझाया नहीं जा सकता। असल में उसकी जरूरत भी नहीं होती।
मैं भी एक कहानी हूँ, और महत्वपूर्ण हूँ अपने लिए। कई और कहानियों का अटूट हिस्सा हूँ, उनका भी किरदार हूँ। मेरी कहानी सुखद है या दुःखद ये गैरजरूरी पहलू है, कभी कोई किसी को सुना पायेगा? ये भी गैरजरूरी सवाल है। जरूरी है, ये अहसास कि मैं हूँ। थोड़ा आगे जाऊँगा तो अद्वैतवाद में ये अहसास भी आकार खो देगा। पर वो विचार फिर कभी...
ये भी, एक ख़तम होती कहानी ही है। बस चेहरे बदल जायेंगे, झड़ते पत्तों के ख़तम होते किरदार नयी कोंपलों की कहानियों का आगाज़ कर जायेंगे।
मेरे एक प्रबुद्ध मित्र, सुबोध ने ये एक फोटो के title में लिखा। ये गहरी बात, मुझे सिर्फ छू नहीं गयी बल्कि अंदर तक हिला गयी, दिमाग में बैठ गयी और कुछ पुराने विचारों को खंगालने का अवसर भी बना और blog की बरसों पुरानी ख़ामोशी भी भरभरा कर टूट गयी।
हर वो चीज जो शुरू होती है, ख़त्म होना उसकी नियति होती है, चाहे वो कहानियाँ हो या किरदार। पर क्या वाकई वो ख़तम होते हैं या अश्वत्थामा का श्राप लिए जीते रहते हैं, बदलते रहते हैं? हम जिसे आरम्भ कह कर जान पाते हैं, वस्तुतः, सिर्फ अपने समझ-बोध तक, क्या वो वास्तव में आरम्भ होता है?
एक पेड़ का आरम्भ, बीज से, और वो बीज कहाँ से आया था? एक ख़त्म होते फल से, वो, वो भी तो किसी पेड़ की खूबसूरत सी कहानी का हिस्सा था, ख़तम होती हुई एक कहानी, जिसने किसी नए किरदार को जन्म दिया और अपना अस्तित्व ख़ुशी से ख़त्म हो जाने दिया। हर गाथा, छोटी हो या हो महागाथा, हर वृतांत, हर रूपक, अपने आप में सम्पूर्ण होकर भी किसी और से सम्बद्ध होता है, आप जितना चाहे इंकार कर लीजिये असंपृक्त रह पाना असंभव है।
मैं, आप, वो, हर कोई एक काव्य से सम्बंधित हैं, अपने आप में भी एक कथा हैं, कहानी हैं। हमारी कहानियाँ भी एक दूसरे की कहानियों से मिलती, उलझती और अलग होती रहती हैं। साथ ही हम भी धीरे धीरे ख़तम होते रहते हैं, और सृजन करते रहते हैं, किसी नए किरदार का, फर्क नहीं पड़ता, जान कर या अनजाने। कभी अचानक एक मोड़ पर एक अहसास होता है, अपनी कहानी का, अपने ही किरदार का और फिर हम परिपक्व होने की ओर अगला कदम बढ़ा देते हैं, एक गहरे सुकून के साथ।
शायद यही वो खास पल होता है, जब उस पेड़ की तरह हम जान जाते हैं, अपने होने का अर्थ, कारण और समय की धार में गढ़ते हुए उस बड़े, बहुत बड़े महाकाव्य में अपनी अहमियत। ये बहुत महत्वपूर्ण अनुभूति, नितांत व्यक्तिगत आनंद, गूँगे का गुड़ हो जाता है, महसूस होता है, बताया, समझाया नहीं जा सकता। असल में उसकी जरूरत भी नहीं होती।
मैं भी एक कहानी हूँ, और महत्वपूर्ण हूँ अपने लिए। कई और कहानियों का अटूट हिस्सा हूँ, उनका भी किरदार हूँ। मेरी कहानी सुखद है या दुःखद ये गैरजरूरी पहलू है, कभी कोई किसी को सुना पायेगा? ये भी गैरजरूरी सवाल है। जरूरी है, ये अहसास कि मैं हूँ। थोड़ा आगे जाऊँगा तो अद्वैतवाद में ये अहसास भी आकार खो देगा। पर वो विचार फिर कभी...
ये भी, एक ख़तम होती कहानी ही है। बस चेहरे बदल जायेंगे, झड़ते पत्तों के ख़तम होते किरदार नयी कोंपलों की कहानियों का आगाज़ कर जायेंगे।