Wednesday, September 13, 2017

ये कौन रहता है मेरे अंदर?

जिंदगी खूबसूरत है...
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मुझे याद नहीं ये कब उतरा था शब्दों में? पर आज फिर मिला और मुझे बहुत ही अच्छा लगा.
अधूरा सा है, बिलकुल मेरी तरह... अरे! मैं ही तो हूँ... और कौन?
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ये कौन रहता है यहाँ? मेरे अंदर? कितना विचित्र? मैं ही अनभिज्ञ अपने आप से? नहीं, कुछ हद तक  शायद सही हो, पर पूरी तरह नहीं। वो तो है, मुझे हौसला और मजबूती देने वाला, कभी कभी मैं उसके साथ बातें करता हूँ।  कभी वो मुझे कहानियाँ सुनाता है, कभी मैं उसे अपने आंसू दिखाता हूँ। 
वो एक बहुरुपिया है, हाँ, एक बहुरुपिया ही तो है। रूप, रंग, भाव… अंदाज़, सब बदलने की काबिलियत रखता, मुझसे हर लिहाज़ से बेहतर, मेरा अंतर्मन। मैं जानता हूँ उसे, वो बहुत शर्मीला है और जल्दी ही समायोजित हो जाता है आस पास के मंज़र से। पर जब मुझे उसकी जरूरत होती है तो जाने कैसे उसे पहले खबर हो जाती है, और वो एक नए या पुराने रूप में मेरी मदद करने आ जाता है। 
कभी कभी वो शरलॉक होम्स बन कर मेरी मदद करता है, मेरी खोई हुई चीजें पाने के लिए, या फिर किसी पे  शक करता हुआ, खोज बीन करने के मूड में।
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फिर लिखूंगा... जरूर... वादा है खुद से खुद का..