गर्मियों का उकताया हुआ आसमान इन दिनों अपने दिल की गाँठ खोल, ढेर सारे गीत सुनाने उमड़ता घुमड़ता नज़दीक चला आता है और कुहनियों के बल लेट कर इस महानगर पर, मुझ पर अपना प्यार बूंदों के रूप में न्योछावर कर देता है| साथ ही मुझे कुछ bless-you वाली wishes और doctor को मुस्कुराने की एक वजह भी मिल जाती है!
इस बरस पहली बारिश में office से घर आते वक़्त भीगा... रास्ते भर उम्मीद का दामन पकड़े और mobile को भीगने से बचाने की जुगत करता रहा और वो एक गीत रह रह कर जेहन में आता रहा 'एक अकेला इस शहर में ... ऑटो वाला ढूंढता है.. taxi वाला ढूंढता है' पर नहीं जनाब, उस दिन कोई नहीं मिला. फिर वापस घर आकर मुझे याद आया के मेरे पास एक अदद छाता है, बाखुशी मैंने उसे लेकर office जाना शुरू कर दिया, और वो दिन है और आज का दिन है.. फिर कभी वैसी बारिश ना हुई.
कुछ भी कहें पर एक बात है मुंबई की बारिश में, महानगर में होकर भी छोटे शहरों, गाँवों वाला मजा भी आता है. लोकल की तेज रफ़्तार और बूंदों के बीच संतुलन बनाता, भागता, दौड़ता शहर, मौसम से होड़ लगाता रहता है! इस महानगर में एक चुम्बकीय आकर्षण है, जो मुझे पिछले 10 सालों से अपनी ओर खींचता रहा है, यहाँ अकेलापन भी है, बेतहाशा भागमभाग भी, लोगों के बीच दूरियां और शक-ओ-शुबहा भी, अनजान चेहरों के बीच खुद से अपरिचित मैं भी, पर फिर भी मुंबई मुझे दूर नहीं जाने देता. ये मौसम इस आकर्षण को और तीखा बना देता है. बहुमंजिला इमारत के किसी ऊंचे माले पर ऑफिस के आदमकद शीशों के पीछे से blinds को किनारे करके देखने पर महानगर सिमटा हुआ, cosy लगने लगता है, गर्मियों की चिलक भांजती धूप में बिखरा सा दिखने वाला शहर, इतना भोला, इतना अपना सा लगने लगता है कि शहर से प्यार ही हो जाए. बस यही एक मौसम है|
इस मौसम का एक अक्स उतर आया उस दिन, जीवन के रंगमंच पर| पवई झील के किनारे उस शाम हलकी फुहारों के बीच हम भुट्टों में अपने दांत गड़ाए, रेशों को दांतों के बीच से निकालने की असफल कोशिश करते सूरज को डूबते देखते रहे. फिर छोटे छोटे प्लास्टिक के कपों में कड़क चाय के घूँट भरते, खिलखिलाते हमने मौसम के साथ मजे किये. झील के बीच बने बगीचे में बैठे, फव्वारे का आनंद भी लिया.
वस्तुतः यायावरी के तस्सवुर से बाहर आकर दिल ने अंगड़ाई ली और हम तर हो गए. ग़म-ए-ज़िन्दगी भूल गए, जन्नत और दोजख में फर्क भूल गए, मौसम का जादू कुछ यों चला के चंद पलों के लिए हम अपनी उम्र को भूल गए|
बारिश में समुन्दर के किनारे बैठना एक जबरदस्त एहसास होता है पर झील का किनारा भी कम नहीं होता. समुंदर की उर्जा जोश देती है और झील की लगभग शांत सतह पर बूंदों का नृत्य मनमोहक होता है. hard rock और classical music के फर्क जैसा... सुकून और सन्देश, दोनों ही जगहों से मिलते हैं. मौका लगे तो इस मौसम को पहाड़ों के साथ जीने की आरज़ू है, पहाड़ों के ऊपर, बादलों से अठखेलियाँ करती हवा के संग बूंदों की स्वर लहरियों की ताल पे थिरकने का मन है.
सावन में मौसम पूरे शबाब पर आ जाता है और धरती भी हरी चूनर ओढ़े, बरसाती पहाड़ी झरनों से श्रृंगार कर इठलाती है, पहाड़ी पर उमड़ता बादल किसी मादक की मानिंद, बेसाख्ता डोलता फिरता है| भादों, रिमझिम फुहारों के बीच, नरम मिजाज़ वालों पर सख्त हो जाता है और बीमारियों की पोटली खोलने लगता है. गीले भीगे तर बतर महीनों के बाद कार्तिक लगते, नहीं लगते, ठण्ड की दस्तक के साथ ही अपने पर समेटने की तैयारी करता हुआ मौसम अगले बरस फिर आने का वादा करने लगता है|
अनगढ़, बेतरतीब विचार मेरी पहचान हैं, और ये ब्लॉग, इन विचारों को शब्द और पहचान देने का, अपने आप से बातें करने का और आप सभी से बांटने का एक जरिया, एक कोशिश. एक itch है, रचनात्मकता की, उसे जिंदा रखने की कोशिश कह लीजिए या फिर कुछ और जो आपको सही लगे.
तलाश कर रहा था, किसकी? पता नहीं...
खुद से ही मिल गया, इत्तेफाक से !!
शुभ रात्रि!!