Wednesday, October 26, 2011

आइये कुछ साझा करें

आइये कुछ साझा करें...

कुछ रोशनी, कुछ  मिठास
कुछ हंसी, कुछ सुवास
थोड़ी सी नोंक-झोंक, बहुत सी मुस्कान
और कुछ साझा हों प्रयास...
बना लें यादगार - ये पर्व, ये त्यौहार!

आइये कुछ साझा करें ...
मेरी फुलझड़ियों की चटचटाहत
आपके अनारों की झिलमिलाहट
उनकी आतिशबाजी से उधार लें ऊंचाई का नज़ारा 
और थोड़ा सा ले लें सुतली बमों का शोर 
मिला दें चकरघिन्नी की फिरकियाँ 
भूलें नहीं कि, हों मिठाइयों सी मीठी बातें
और मजबूत हो सकें रिश्ते 
इस उत्सव में आइये साझा करें
और बांटा करें सभी से
खुशियाँ, प्यार और दुलार... 

आइये कुछ साझा करें

Monday, October 17, 2011

Duality - द्वैत.

द्वैत ... काफी लोगों के लिए यह थोड़ा कठिन शब्द होगा.. पर सिर्फ तभी तक, जब तक हिंदी में है. English में इसका करीबी शब्द मिल जाने से बहुत जल्दी समझ आ जाता है. मजेदार है ना|  द्वैत या duality में जीना अपने आप में बहुत मुश्किल बात है और उस दुविधा को व्यक्त कर पाना और भी मुश्किल. 
दुविधा सिर्फ सही और गलत का फैसला करने में हो या दो-तीन में से किसी एक को चुनने की हो तो शायद बाहरी मदद से हल निकाला जा सकता है या कम से कम एक ईमानदार कोशिश तो की ही जा सकती है| मदद, ख़ुद अपने ज़मीर या अपने अंतर्मन की आवाज के सहारे भी मिल सकती है यदि उसे सुन पाने की ललक और हिम्मत हो|  हाँ, ये दूसरी मदद अक्सर कहीं ज्यादा मददगार होती है!
पर जब बात व्यक्तितत्व या अस्तित्व के टुकड़ों में बंटने की हो तो मामला बहुत अलग हो जाता है. ये डगर और कठिन होने लगाती है जब दोनों, तीनों, चारों सभी हिस्से अपने अपने वज़ूद को, अपने 'होने' को justify कर सकते हों, और इसीलिए अपनी जगह पर सही हों| 
'दीवानगी' या फिर 'Primal Fear' (movies) के चरित्रों से काफी अलग.   Hello ... I am still not a victim of split personality... [... I hope! :-) keeping my fingers crossed!! ]
यहाँ मामला सिर्फ एक से जुड़ा है - स्वयं से.  मैं क्या हूँ? इस सवाल का जवाद मुझे सिर्फ और सिर्फ अपने आप को देना होता है और यहीं सबसे बड़ी समस्या की शुरुआत होती है| ज़माने को कोई बात मनवाने से पहले अपने आप को convince कर पाना, बस यहीं आ कर गाड़ी रुक जाती है| 
तलवार की धार पर चलने वाली बात है... कितने सारे "मैं" हूँ??  कौन सा "मैं" थोड़ा ज्यादा मेरा है, बाकियों की तुलना में? वो थोड़ी कड़वे स्वाद वाली coffee सरीखा, वो तितलियों सा उड़ता फिरता, कभी हिमालय की गोद में बैठे शांत पलों सा स्वर्गिक अबोला सा, कभी बचपन को गले लगाने आतुर, कहीं छोटी छोटी खुशियों पर खुल कर ठहाके लगाता हुआ, वो वहां गुमसुम, अकेला, depressed; ये यहाँ नाचने को बेताब... एक "मैं" डरता भी है, और एक डराता भी है, एक को गुमनामी पसंद है, दूसरे को यूँ गाना, मानो कोई सुन ही नहीं रहा; एक लालची लोलुप कहता है take all ; एक कहता है give all and you will be free! क्या करूँ?? किसकी सुनूँ? ये सभी तो मेरे ही हैं..|
मेरे अन्दर शायद 'compartmentalization' हो गया है, खाके खिंच गए हैं और कारण बहुत दूर नहीं है, बहुत ज्यादा भी नहीं हैं| पर सब कुछ मनचाहा मिल जाए, वो भी आसानी से, बगैर वक़्त, उर्जा लगाये, तो शायद पाने का मजा नहीं आता| बड़े बच्चन सर, मधुशाला में कह गए हैं - 
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।
ये खाके, ये हिस्से, तोहफे हैं ज़िन्दगी के; शायराना मिजाज़ में सोचने की कोशिश करूँ, तो एक गीत की पंक्तियाँ याद आती हैं - ज़िन्दगी को बहुत प्यार हमने दिया, मौत से भी मोहब्बत निभाएंगे हम.... 
अभी अंतिम मुकाम दूर है, अभी तो ज़िन्दगी के तोहफों से मोहब्बत करने की बारी है...
हाथ बढ़ा ऐ ज़िन्दगी, आँख मिला के बात कर... !!