I suddenly recalled a movie named 'Friday, The 13th' .... it was a horror movie. Coincidentally, something happened with me on '13th May' and it was a Friday too!! बस अंतर सिर्फ इतना था कि मेरे लिए ये डरावना और 'दर्दनाक' भी था.... अरे ज्यादा मत सोचिये, शुक्रवार, 13 May को मेरी एक अक्ल दाढ़ (wisdom tooth) निकालनी पड़ी... ये जबड़े के आखिर में थी और तिरछी थी.. मुझे काफी अच्छे से समझ में आ गया क्यों लोग dentist के पास जाने से डरते हैं? :-)
खैर, मुद्दे की बात ये थी कि दर्द से भरे उन लम्हों (जब injection का असर ख़त्म हो गया) के बीच, सोचते विचरते हुए अचानक से मुझे महसूस हुआ मानो मैंने प्रौढ़ (बूढ़ा नहीं) होने की ओर एक और कदम बढ़ा दिया हो. उम्र का एक पड़ाव आ गया हो जैसे... अब दांत , उम्रदराज होने पर ही निकलवाने पड़ते हैं ना. :-)
उम्रदराज होने का अपना अलग ही मजा है, जितना अपने आप को समझने की कोशिश करता हूँ उतना ही ज्यादा हैरान होता जाता हूँ. कितनी विचित्र बात है कि वो बातें जो मैं कभी हवा में उड़ा देना पसंद करता था और कभी भी उन पर विश्वास नहीं होता था, उम्र के साथ साथ वही बातें ना सिर्फ समझ आने लगी हैं बल्कि बहुत relevant भी लगने लगी हैं. पर साथ ही साथ कुछ छूटने का अहसास बढ़ता जा रहा है. यादें, धुंधली होती जा रही हैं और अपनी पहचान अपनी ही नज़रों में बनाये रखने की जद्दोजहद तेज होने लगी है. 'लोग क्या सोचेंगे' से ज्यादा मैं अपनी सोच पर ध्यान देने लगा हूँ.
बातें हैं ढेर सारी और शब्द उतने ही कम; ये मेरी हमेशा की दिक्कत है.
वस्तुतः पिछले कुछ हफ़्तों से मैं, बिलकुल एक तटस्थ दर्शक की तरह, जिंदगी के सफ़र को देख रहा हूँ. सफ़र में हूँ, पर फिर भी नहीं हूँ. फलसफे में भी हूँ, पर उससे परे भी हूँ, खुश भी हूँ और नहीं भी, दर्द होता है पर पीड़ा नहीं है, ... mostly as they say, pain is inevitable, suffering is optional. Probably, I have just started to differentiate between two; guess what, I have found that even happiness is optional. I am the one who can chose for me.
दूसरा पहलू भी है; इधर बहुत सी चीजें बदल रही हैं, खासी तेजी के साथ और साथ में बदलता जा रहा हूँ - "मैं" . पर एक निर्लिप्त सा भाव उभर रहा है, गुस्सा अभी भी आता है, पर इतने जल्दी चला जाता है कि उसे दिखावे के तौर पे कभी कभी झूठा ही ओढ़ना पड़ता है. कभी कभी मुझे, अपने होने के बारे में, अपने आप को ही बताना पड़ता है. मानो मैं यहाँ हो कर भी यहाँ नहीं हूँ. अकर्मण्यता और निर्लिप्तता के बीच में बहुत थोड़ा सा अंतर होता है शायद; पर नहीं, मैं कर्म से नहीं भाग रहा,बिलकुल भी नहीं.
अब एक विश्लेषणात्मक पहलू हावी हो रहा है, 'क्या किया'? से ज्यादा 'क्यों किया'? 'क्या और बेहतर हो सकता था?' ऐसे प्रश्न मुंह बाये खड़े हो जाते हैं, कभी कभी धीरे से, कभी एकदम अचानक! निपट सीधे, धारदार प्रश्न!
अब, बस अभी, क्या है जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्या मैं वही कर रहा हूँ? निराशा तब होती है जब इस प्रश्न का सकारात्मक जवाब तुरत नहीं उबल पड़ता. जिंदगी का मतलब खोजते खोजते, मुट्ठी में बंद रेत के मानिंद जिंदगी की गिरफ्त से लम्हों के फिसलते जाने का अहसास, बस यही एक चीज है जो मुझे उदास कर जाती है.
यदि ये आपको बहुत ऊटपटांग लगा हो तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा.. अभी evolution जारी है. ज्यादातर वक़्त मैं अपनी कहानी आपको नहीं, अपने आप को सुनाने और समझाने की कोशिश करता रहा हूँ.
अंत में एक बात - कुछ हफ़्तों पहले एक लेखक से किस्मत ने मिला दिया, उन्होंने एक समझाइश दी, बोले, ज्यादा की जरूरत नहीं, बस 500 शब्द रोज लिखो. मुझे बात भा गयी. पर ये इतना मुश्किल होगा, ये अंदाज़ ही नहीं था. तो मैंने लक्ष्य थोड़ा बदल लिया .... मैंने 500 शब्द प्रतिदिन को प्रति सप्ताह कर लिया. पर सब कुछ blog पर देना संभव नहीं हो रहा (उतना अच्छा मैं अभी तक नहीं लिख पा रहा हूँ) पर जल्दी ही मैं ऐसा कर सकूंगा, उम्मीद है.
शुभ रात्रि!!
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Hi..!
Thanks a lot for taking out your valuable time for commenting on my post. Your inputs will help me in more than one way.
Regards,
Sandy