Sunday, June 14, 2020

इंजीनियर और गुड़ की भेली

तो सुधीजनों, एक इंजीनियर बाबू थे, २२-२३ साल पहले पढ़े रहे तो इंजीनियर थे और रहेंगे, जे बात नहीं बदल सकती। नाम का क्या करेंगे, पर रख ही लीजिये।  बाबू, यही नाम चलेगा।  हाँ तो बात कहाँ से शुरू हुई? इन से कभी किसी ने एक घुमावदार सा सवाल कर लिया और मजे से इन्हें तुरंत ही जवाब सूझ गया तो बस फिर, खुश हो गए कि हम अभी तक धार में हैं भाई!!
अब ये आया lockdown जो बहुतों को बहुत कुछ सिखा गया और अभी तक सिखा रहा है।  तो भैया, बाबू अकेले ही रह थे। खाने पीने के वास्ते भी आत्मनिर्भर ही हुए रहे. कभी गुड़, पाउडर के रूप में ले आये कभी गीला गुड़ उठा लिए, मजे में बना खा रहे थे। इस बार जोश में गुड़ की भेली उठा ले आये।  आपने तो देखी होगी भेली? आइसक्रीम कोन आधा काट के उल्टा कर के याद कीजिये, बस उसी आकर में भेली थी।
तो बाबू अटक गए, ये भेली तो डब्बे में उतरने को नहीं देख रही। तो इसे तोडना पड़ेगा! पर कैसे? चाकू , आलू छिलना (peeler ) try कर लिया, नुकीले हिस्से तिरछे हो गए पर भेली में ढंग से गड्ढा भी ना हुआ।  समस्या घनी हो चली थी, क्योंकि वो अब रविवार का दिलचस्प चैलेंज बन चुकी थी। दिमाग के घोड़े दौड़ाये गए, इधर से उधर तक, फ्लैट के एक कोने से दूसरे तक सब जगह विचारों में घूम के देख लिया, ना कुछ हथोड़े जैसा कुछ मिला ना ही मजबूत खीला या कील जिससे भेली को, उसके गुरुर को तोड़ा जा सके।
टेक्नोलॉजी का जमाना है, सारी मदद बस एक कॉल दूर है, तो दोस्तों बाबू ने भी एक्सपर्ट से सलाह करना जरुरी समझा। तुरत ही फ़ोन लगाया गया एक्सपर्ट को, और पहले वहां से स्थिति को समझने के लिए जरूरी सवाल दागे गए, मसलन, क्या क्या उपलब्ध है घर में? पता चला बेलन है! बताया गया, कि बेलन को हथौड़े जैसे उपयोग करने की कोशिश की जाए। पहली कोशिश में कुछ ख़ास हासिल ना हुआ।  फिर बताया गया कि चाकू साथ में इस्तेमाल किया जाए, पर बात अभी भी नहीं बनी। अब बात आयी और कौन से resources उपलब्ध हैं? मजबूत सी चम्मच मिली, हाँ तो फिर चम्मच ऐसे रखो और बेलन से मारो, फिर क्या था बाबू पूरे जोश में ख़ुशी ख़ुशी कॉल ख़तम किये और पिल पड़े। 
चम्मच रखी गयी भेली पे, हैंडल वाला हिस्सा नीचे और ऊपर से दे बेलन धमाधम! पर भैया, भेली ने ना टूटना था, तो ना टूटी।  ५-१० मिनट की मेहनत और लाल हो चुके हाथों ने फिर चेताया, सलाह को याद किया और फिर अचानक भक्क से एक बल्ब जल उठा, बिलकुल वैसे ही जैसे किस्सों में होता है, और उस चम्मच को 'ऐसे' रखो वाली बात समझ आयी और इंजीनियर बाबू ने चम्मच को आड़ा कर के रखा और फिर से मेहनत करनी शुरू की! इस बार बात बन गयी और धीरे धीरे भेली ने हार मान ली और बाबू के चेहरे पे हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद जैसा सुकून देती ४ इंची मुस्कान आ गयी! finally, एक आध घंटे के बाद भेली के टुकड़े सफलता पूर्वक डब्बे में भर दिए गए!
बूझिये तो जरा, वो एक्सपर्ट कौन थे? मेरा मतलब, कौन थीं? सही पकडे हैं, बाबू यानि इंजीनियर की मम्मी जी और कौन? कित्ते भी बड़े हो जाओ, मम्मी एक्सपर्ट ही होती हैं, और उनके पास सारी समस्याओं का हल मिल ही जाता है!
तो बस, ऐसे इंजीनियर और गुड़ की भेली का किस्सा संपन्न हुआ! 

5 comments:

Hi..!
Thanks a lot for taking out your valuable time for commenting on my post. Your inputs will help me in more than one way.

Regards,

Sandy