यात्रायें हम सभी करते हैं और काफ़ी करते हैं। जब हम किसी यात्रा की तैयारी करते हैं तो किस बारे में ज्यादा ख्याल रखते हैं? वैसे तो इस पर सभी की राय अलग अलग हो सकती है और यात्रा के उद्देश्य पर भी निर्भर होता है कि किस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाये। लेकिन एक बात लगभग समान ही होती है कि कुल सामान कम से कम हो। हमारी जरुरतों की परिभाषा अचानक से छोटी हो जाती है, प्राथमिकतायें बदल जाती हैं, दृष्टिकोण बदल जाता है। यदि आप अकेले चल रहे हों तो यह दायरा और भी संकुचित हो जाता है। घर पर जो चीज ‘जरुरत’ की श्रेणी में होती थी अब वही चीज ‘कम जरूरी’ या शायद ‘गैर-जरूरी’ श्रेणी में आ जाती है। मसलन वो बीस जोड़ी कपड़े अब फालतू जगह घेरने वाले दिखते हैं और सिर्फ चार-पांच या शायद और भी कम आपके लिये ‘पर्याप्त’ हो जाते हैं। कमोबेश यही हाल हर चीज का होता है। अचानक ही हम ‘संतोषी’ प्रवृत्त्ति के होने लगते हैं। अचानक ही हम समझौता करने के लिये तैयार हो जाते हैं, दूसरों से नहीं, अपने आप से समझौता करने के लिये। अगर आप के साथ आपके प्रिय लोग भी हैं तो उनके प्रति आप एक अलग जिम्मेदारी के भाव से भर जाते हैं।
शायद सोच में आने वाला यह बदलाव उन बड़े कारणों में से एक रहा होगा जिसके चलते महान लोगों ने जीवन को यात्रा के रूप मे परिभाषित, स्वीकार और प्रचारित किया। जीवन को यात्रा रूप में मानने के और भी इतने ही वज़नदार कारण और दृष्टिकोण बताये जा सकते है। मिसाल के तौर पर, दोनों में एक निश्चित उद्देश्य का होना, अपने आप में पर्याप्त और महत्वपूर्ण समानता है जो कि जीवन को यात्रा रूप में देखा जाना सार्थक करता है। संपूर्ण कर्मयोग भी इसी विचारधारा का समर्थन करता हुआ दिखता है।
एक बार आप जान लें कि यात्रा और जीवन के बीच कितनी समानतायें हैं फिर देखिये जीवन के प्रति दृष्टिकोण कितनी जल्दी बदल जाता है। जरूरतों का आकार सिमटने लगता है। प्राथमिकतायें लगभग तुरंत ही बदलने लगती हैं। ऐसा नहीं है कि भौतिक और मूलभूत आवश्यकतायें अचानक से गायब हो जायेंगी ना ही आप बैरागी या सन्यासी हो जायेंगे लेकिन जो बातें पहले अतिमहत्वपूर्ण थीं शायद उनका क्रम काफी नीचे आ जायेगा या हो सकता है वो अब अपना स्वरूप बदल लें। एप्पल के संस्थापकों में से एक – स्टीव जॉब्स् का प्रश्न भी इसी विचार के समानांतर चलता है। उनका कहना है कि जब आप जीवन के किसी बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हों तो अपने आप से पूछें कि आप का निर्णय क्या होता यदि यह दिन आपकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होता? यह प्रश्न भी प्राथमिकताओं के निर्धारण के लिये बहुत ही उपयुक्त सिद्ध हो सकता है अंतर सिर्फ इस बात का है कि यह प्रश्न जीवन के एक मोड़ पर खड़े व्यक्ति की तत्कालीन, सबसे महत्वपूर्ण चाहत को उभार कर सामने ला देता है, जिसे हम कह सकते हैं दिल की आवाज़ को सुनना। वहीं जीवन को यात्रा रूप में स्वीकारना बड़े और व्यापक स्तर पर प्राथमिकता निर्धारण में मदद करता है और दूरदर्शिता भी देता है।
मेरा उद्देश्य धार्मिक या आध्यात्मिक चिंतन नहीं है परंतु आध्यात्मिकता का पुट आना इतना अप्रासंगिक भी नहीं है क्योंकि जीवन और आध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। थोड़ा विषय परिवर्तन हो चला है, वापस यात्रा और जीवन की निकटता का उदाहरण देखते हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि यात्रा के वक्त कुछ ही देर में आप अपने कितने अधिक नज़दीक हो जाते हैं? आप चाहें या ना चाहें आपके विचार आपको वहां ले जाते हैं जहां आप रोज की भागमभाग वाली दिनचर्या में नहीं जा पाते। भला क्यों? शायद इसलिये कि यात्रा में दीगर बातों से आप कट जाते हैं, मोबाईल का नेटवर्क आपका साथ छोड़ देता है और आपको अपने पास बैठने का बेहद जरूरी वक्त मिल जाता है। यात्रा का माध्यम कुछ भी हो पर आप शायद और बहुत सी चीजों पर गौर करने लायक वक्त निकाल सकते हैं। मसलन सड़क के किनारे खेलते वो बच्चे, तेजी से पीछे जाती पेड़ों की कतारें, शाम का डूबता सूरज, बादल, तारों भरा आसमान (पिछली बार कब आपने इतने तारों को एक साथ देखा था जरा याद करने की कोशिश कीजिये) और भी ढेर सारी चीजें जिसमें आप स्वयं भी शामिल हैं। अब सोचिये यदि एक छोटी यात्रा इतनी ‘नयी’ चीजें आपके सामने ला सकती है तो समग्र जीवन को यात्रा के रूप में देखना कितनी नयी बातें आपके सामने ला देगा? कई बार जो विचार यात्रा के दौरान आते रहते हैं उनके स्तर पर तब जा पाना जब आप अपने गंतव्य पर पहुंच जाते हैं, बहुत ही चुनौती भरा हो जाता है। यकीन जानिये इस पूरे विचार का प्रारंभ मेरी एक यात्रा से ही हुआ था, आज या कल नहीं पर काफी दिनों पहले। मुझे इन विचारों को शब्दों में ढालने में बहुत ज्यादा वक्त लगा। लेखकों जैसी प्रखर दृष्टि और क्षमता ना होने से विचार मूल रूप में रख पाना मेरे लिये बड़ी मशक्कत का काम हो जाता है। लेख को अंत में एक मोड़ देना और भी दुरूह है, आपका सहयोग काफी मददगार होगा। इसलिये आपसे अनुरोध करता हूं कि आप अपने अमूल्य अनुभव, विचार, समीक्षा जो भी आप उचित समझें, जरूर साझा करें।
शायद सोच में आने वाला यह बदलाव उन बड़े कारणों में से एक रहा होगा जिसके चलते महान लोगों ने जीवन को यात्रा के रूप मे परिभाषित, स्वीकार और प्रचारित किया। जीवन को यात्रा रूप में मानने के और भी इतने ही वज़नदार कारण और दृष्टिकोण बताये जा सकते है। मिसाल के तौर पर, दोनों में एक निश्चित उद्देश्य का होना, अपने आप में पर्याप्त और महत्वपूर्ण समानता है जो कि जीवन को यात्रा रूप में देखा जाना सार्थक करता है। संपूर्ण कर्मयोग भी इसी विचारधारा का समर्थन करता हुआ दिखता है।
एक बार आप जान लें कि यात्रा और जीवन के बीच कितनी समानतायें हैं फिर देखिये जीवन के प्रति दृष्टिकोण कितनी जल्दी बदल जाता है। जरूरतों का आकार सिमटने लगता है। प्राथमिकतायें लगभग तुरंत ही बदलने लगती हैं। ऐसा नहीं है कि भौतिक और मूलभूत आवश्यकतायें अचानक से गायब हो जायेंगी ना ही आप बैरागी या सन्यासी हो जायेंगे लेकिन जो बातें पहले अतिमहत्वपूर्ण थीं शायद उनका क्रम काफी नीचे आ जायेगा या हो सकता है वो अब अपना स्वरूप बदल लें। एप्पल के संस्थापकों में से एक – स्टीव जॉब्स् का प्रश्न भी इसी विचार के समानांतर चलता है। उनका कहना है कि जब आप जीवन के किसी बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हों तो अपने आप से पूछें कि आप का निर्णय क्या होता यदि यह दिन आपकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन होता? यह प्रश्न भी प्राथमिकताओं के निर्धारण के लिये बहुत ही उपयुक्त सिद्ध हो सकता है अंतर सिर्फ इस बात का है कि यह प्रश्न जीवन के एक मोड़ पर खड़े व्यक्ति की तत्कालीन, सबसे महत्वपूर्ण चाहत को उभार कर सामने ला देता है, जिसे हम कह सकते हैं दिल की आवाज़ को सुनना। वहीं जीवन को यात्रा रूप में स्वीकारना बड़े और व्यापक स्तर पर प्राथमिकता निर्धारण में मदद करता है और दूरदर्शिता भी देता है।
मेरा उद्देश्य धार्मिक या आध्यात्मिक चिंतन नहीं है परंतु आध्यात्मिकता का पुट आना इतना अप्रासंगिक भी नहीं है क्योंकि जीवन और आध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। थोड़ा विषय परिवर्तन हो चला है, वापस यात्रा और जीवन की निकटता का उदाहरण देखते हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि यात्रा के वक्त कुछ ही देर में आप अपने कितने अधिक नज़दीक हो जाते हैं? आप चाहें या ना चाहें आपके विचार आपको वहां ले जाते हैं जहां आप रोज की भागमभाग वाली दिनचर्या में नहीं जा पाते। भला क्यों? शायद इसलिये कि यात्रा में दीगर बातों से आप कट जाते हैं, मोबाईल का नेटवर्क आपका साथ छोड़ देता है और आपको अपने पास बैठने का बेहद जरूरी वक्त मिल जाता है। यात्रा का माध्यम कुछ भी हो पर आप शायद और बहुत सी चीजों पर गौर करने लायक वक्त निकाल सकते हैं। मसलन सड़क के किनारे खेलते वो बच्चे, तेजी से पीछे जाती पेड़ों की कतारें, शाम का डूबता सूरज, बादल, तारों भरा आसमान (पिछली बार कब आपने इतने तारों को एक साथ देखा था जरा याद करने की कोशिश कीजिये) और भी ढेर सारी चीजें जिसमें आप स्वयं भी शामिल हैं। अब सोचिये यदि एक छोटी यात्रा इतनी ‘नयी’ चीजें आपके सामने ला सकती है तो समग्र जीवन को यात्रा के रूप में देखना कितनी नयी बातें आपके सामने ला देगा? कई बार जो विचार यात्रा के दौरान आते रहते हैं उनके स्तर पर तब जा पाना जब आप अपने गंतव्य पर पहुंच जाते हैं, बहुत ही चुनौती भरा हो जाता है। यकीन जानिये इस पूरे विचार का प्रारंभ मेरी एक यात्रा से ही हुआ था, आज या कल नहीं पर काफी दिनों पहले। मुझे इन विचारों को शब्दों में ढालने में बहुत ज्यादा वक्त लगा। लेखकों जैसी प्रखर दृष्टि और क्षमता ना होने से विचार मूल रूप में रख पाना मेरे लिये बड़ी मशक्कत का काम हो जाता है। लेख को अंत में एक मोड़ देना और भी दुरूह है, आपका सहयोग काफी मददगार होगा। इसलिये आपसे अनुरोध करता हूं कि आप अपने अमूल्य अनुभव, विचार, समीक्षा जो भी आप उचित समझें, जरूर साझा करें।
Sandeep Bhai..Blogs in Hindi are good... and congratulations for mastering it...But...it is a little difficult for people like us to read through :-(
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