Saturday, May 08, 2010

बेचैनी

पता नहीं आज कल क्या चलता रहता है दिमाग में
फुरकत-ए-ज़िन्दगी बुनती है मकड़ जाल मेरे दिमाग में
खुदकुशी के ख्यालों से लेकर दीवाना हो जाने तक
भोग विलास से लेकर त्याग वैराग्य तक
नफ़रत के अंधेरों से प्यार के उजालों तक
नैराश्य की खाइयों से उमंगों की बेसाख्ता उड़ानों तक
फिर कभी बेचैन होकर भागता हूँ,
या शायद भागते भागते बेचैन हो जाता हूँ
धड़कने सुनाई देती हैं हथोड़े जैसी 
ज़िन्दगी लगती है बोझ जैसी
अगले ही पल एक नन्ही सी अनाम मुस्कान
किसी अनजान निष्पाप बालक की,
कुछ और ही गुनगुना जाती है मेरे कानो में
दूसरा पहलू भी है ज़िंदगी का
ये सबक सिखा जाती है 
बेचैनी के लम्हों के बीच खोजता हूँ मैं अपने आप को
दूसरों के जीवन माधुर्य के बीच अपनी खुशियों को
बड़े-बड़े, तोड़ कर चकनाचूर कर डालने वाले डरों के बीच
मैं खोजता हूँ खो गयी छोटी छोटी खुशियों को
और पाना चाहता हूँ वापस अपने प्रति अपने ही प्यार को
जाने क्या है ये
खो जाने का डर या 'मैं' को खोने कि ख़ुशी
एक नया अहसास या ग़म की इक नयी लहर का इंतज़ार

 हाँ ... मैं सीख रहा हूँ चलना फिर से
हाँ ... मैं सीख रहा हूँ जीना फिर से
हाँ ... थोड़ा और बड़ा हूँ मैं आज... कल से

1 comment:

Hi..!
Thanks a lot for taking out your valuable time for commenting on my post. Your inputs will help me in more than one way.

Regards,

Sandy