Sunday, February 20, 2011

एक बार फिर !!


फिर से कुछ नयी कोशिश की है... 'शेर' कहना तो बहुत ज्यादा हो जाएगा.. बस चंद पंक्तियाँ हैं. 
आप भी अपने विचार बताइए इस बारे में... मैं इंतज़ार कर रहा हूँ!

इंतेहाँ हो गई दर्द सहते रहने की,
बस पैमाने छलक पड़े सब्र के  

उसकी बेवफाई के चर्चे तो बस शुरू ही हुए थे
यूं लगा कि जमाने हो गये खुल कर हंसे हुए

हमारी मुस्कुराहटों को नामंजूर वो खुद करते रहे
और हम समझे शरारतें थीं वो नादान ‘साले’ की

मुद्दतें हो गयीं थी उसकी एक मुस्कान को देखे
जो काम प्यार न कर सका, पैसे ने कर दिखाया!  


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Hi..!
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Regards,

Sandy