फिर से कुछ नयी कोशिश की है... 'शेर' कहना तो बहुत ज्यादा हो जाएगा.. बस चंद पंक्तियाँ हैं.
आप भी अपने विचार बताइए इस बारे में... मैं इंतज़ार कर रहा हूँ!
इंतेहाँ हो गई दर्द सहते रहने की,
बस पैमाने छलक पड़े सब्र के
बस पैमाने छलक पड़े सब्र के
उसकी बेवफाई के चर्चे तो बस शुरू ही हुए थे
यूं लगा कि जमाने हो गये खुल कर हंसे हुए
यूं लगा कि जमाने हो गये खुल कर हंसे हुए
हमारी मुस्कुराहटों को नामंजूर वो खुद करते रहे
और हम समझे शरारतें थीं वो नादान ‘साले’ की
और हम समझे शरारतें थीं वो नादान ‘साले’ की
मुद्दतें हो गयीं थी उसकी एक मुस्कान को देखे
जो काम प्यार न कर सका, पैसे ने कर दिखाया!
जो काम प्यार न कर सका, पैसे ने कर दिखाया!
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Hi..!
Thanks a lot for taking out your valuable time for commenting on my post. Your inputs will help me in more than one way.
Regards,
Sandy